मेरी ऐसी रूह , जो मंज़िल-तस्कि पा ना सकें.....
अपने दर्द -ऐ-मोहब्बत के सपनो को, सजा न सकें।
जीने को जिये जाते है मगर,सांसो की रिदायें जलती है,
खामोस वफाये जलती है।
संगीन हवा जाड़ो में, ख्वाबों की चिताएं जलती है।
चंद लम्हों के बाद...
फिर से इस चाँदनी के नीचे ,दो सायें लहरायें है
फिर दो दिल मिलने आये है
इस पल भी मौत की आंधी उठी है,फिर जंग के बादल छाए है।
तब सोचा....की उनका ऐसा अंजाम ना हो,
उनका जुनून बदनाम ना हो
उनके नसीब में ,लहू में लिपटी शाम ना हो।
अपने प्यार की सुरुआत का वह शाम याद है मुझे,
चाहत की ख्वाबों का अंजाम याद है मुझे।
हमारे प्यार को दुनिया की नज़र लग गई
मुरादे तो पूरी नही हुई पर उसकी रात मिल गई
यहां तो कश्मकश दिल का दर्द ही लिखी है,
फिर भी रहता हूं खुस ,क्योकि
हमे उनकी सुनहरी याद मिल गई।
अनिकेत सिंह कुशवाहा